महफ़िल में हँसे तन्हाइयों में रोया किये

महफ़िल में हँसे तन्हाइयों में रोया किये
अपने ज़ख्मो को आँसुओं से धोया किये

कोमल बाँहों के तकिये किस्मत में कहाँ
हम तो कांटो के बिस्तर पर सोया किये

हमारी क्यारी में इक फूल भी न खिला
शायद हम ही बीज रेत् में बोया किये

मुकेश इलाहाबादी -------------------

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