करता है वो अपनी मन मर्ज़ी का
करता है वो अपनी मन मर्ज़ी का
ये दिल सुनता कहाँ है किसी का
जहाँ दरिया बहा करता था वहाँ
निशान बता रहे हैं सुखी नदी का
अपने हौसले व बाजुओं के बाद
करता हूँ भरोसा सिर्फ खुदी का
न झील है न दरिया न समन्दर
क्यां करूँ मै अपनी तिश्नगी का
न ज़ख्म भरे न ही दवा मिली
क्या करूँ मै ऐसी ज़िंदगी का
मुकेश इलाहाबादी -----------
आपकी लिखी रचना ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" बुधवार 20 जनवरी 2021 को साझा की गयी है.............. पाँच लिंकों का आनन्द पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!
ReplyDeleteसुन्दर लेखन
ReplyDeleteसुन्दर
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