हवा की अंतिम चिट्ठी”
हवा की अंतिम चिट्ठी”
प्रिय मनुष्य,
यह मेरी
आख़िरी चिट्ठी है
क्योंकि
अब मुझमें
इतनी ताक़त नहीं बची
कि मैं
तुम तक बार-बार पहुँच सकूँ।
तुमने
मुझे कभी देखा नहीं,
पर
हर पल
मेरे सहारे जिए
फिर भी
तुमने
मुझे
सबसे हल्का समझा।
मैं
तुम्हारी पहली साँस थी,
और
तुम्हारी आख़िरी भी हो सकती थी
पर तुमने
मुझे
धुएँ में बदल दिया।
मैं
पहाड़ों से उतरती थी
गीत बनकर,
पेड़ों से गुजरती थी
खुशबू बनकर,
नदियों को छूती थी
ठंडक बनकर
पर अब
मैं
फैक्ट्रियों में फँस गई हूँ,
चिमनियों में अटक गई हूँ,
और
तुम्हारे शहरों में
खाँसती हुई भटकती हूँ।
तुमने
मेरे रास्ते बंद कर दिए
ऊँची-ऊँची इमारतों से,
बंद खिड़कियों से,
और
अपने ही डर से।
अब
मैं बहना चाहती हूँ
पर
हर जगह
मुझे रोका जाता है,
जैसे
मैं कोई खतरा हूँ।
तुम्हें पता है
जब तुम
थककर बैठते हो,
और
एक गहरी साँस लेते हो
तो
मैं
अब भी
तुम्हें बचाने की कोशिश करती हूँ।
पर
हर साँस के साथ
मैं
थोड़ी-थोड़ी मरती जा रही हूँ।
एक दिन
ऐसा आएगा
जब तुम
बहुत ज़ोर से
साँस लेना चाहोगे,
पर
मैं
वहाँ नहीं होऊँगी।
और तब
तुम समझोगे
कि
मैं
सिर्फ़ हवा नहीं थी,
मैं
तुम्हारी ज़िंदगी थी।
मैंने
कभी तुमसे
कुछ नहीं माँगा
बस
थोड़ी-सी जगह,
थोड़ी-सी हरियाली,
और
थोड़ा-सा सम्मान।
पर
तुमने
मुझे
एक आँकड़ा बना दिया
AQI,
पार्टिकल,
रिपोर्ट…
और
मैं
एक एहसास से
एक समस्या बन गई।
अब
मैं जा रही हूँ
धीरे-धीरे,
खामोशी से
जैसे
मैं कभी थी ही नहीं।
अगर
कभी
तुम्हें
मेरी याद आए
तो
किसी पेड़ के नीचे बैठना,
आँखें बंद करना,
और
एक गहरी साँस लेना
अगर
मैं वहाँ मिल जाऊँ
तो समझ लेना
कि
मैंने तुम्हें
अब भी माफ़ किया हुआ है।
वरना
यह चिट्ठी
सिर्फ़ एक स्मृति बन जाएगी।
तुम्हारी ही
जो कभी
तुम्हारे भीतर रहती थी,
हवा।
मुकेश ,,,
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