तल्ख़ियाँ

 तल्ख़ियाँ


तल्ख़ियाँ

वो जो ज़ुबाँ पर नहीं,

रूह के किनारों पर

धीरे-धीरे जम जाती हैं।


कभी तेरी चुप में,

कभी मेरी बातों में,

कभी उन लम्हों में

जहाँ हम थे

मगर सच में

कभी मिले ही नहीं।


ये तल्ख़ियाँ

शोर नहीं करतीं,

बस मुस्कुराहटों के पीछे

एक खामोश साया बनकर

चलती रहती हैं।


मोहब्बत भी अजीब है

जितनी गहरी होती है,

उतनी ही बारीक

तल्ख़ियाँ छोड़ जाती है,

जैसे मीठे में

हल्की-सी कसैलापन।


मैंने चाहा था

तुम्हें पूरा महसूस करना,

मगर शायद

हर एहसास के साथ

थोड़ी-सी दूरी

लिखी होती है।


अब जो बचा है

ना वो ग़म है,

ना पूरी ख़ुशी,

बस कुछ तल्ख़ियाँ हैं

जो यादों में घुलकर

एक अजीब-सा सुकून दे जाती हैं।


और अजीब बात ये है

इन तल्ख़ियों के बिना

शायद मोहब्बत

इतनी सच्ची भी न लगती।


मुकेश ,

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