गर्म साँसों में ठहरी हुई बारिश

 गर्म साँसों में ठहरी हुई बारिश


गर्म साँसों में

ठहरी हुई बारिश

जैसे कोई एहसास

होंठों तक आकर

रुक गया हो।


हवा में नमी है,

पर बादल कहीं नहीं,

बस तेरी क़ुर्बत का असर है

जो फ़िज़ाओं को

भीगा-भीगा सा रखता है।


धूप भी आज

कुछ धीमी-सी लगती है,

जैसे उसे भी

इस ठहराव का एहतराम हो

वो जलती नहीं,

बस हल्के से छूती है।


मेरे और तेरे दरमियान

एक ख़ामोश लम्हा है,

जिसमें ना बारिश गिरती है,

ना साँसें थमती हैं

बस दोनों

एक-दूसरे में

धीरे-धीरे घुलते रहते हैं।


तेरी गर्म साँसों की लय पर

ये ठहरी हुई बारिश

कोई गीत नहीं गाती,

फिर भी लगता है

हर बूँद में

एक अनकहा इकरार है।


कभी लगता है


ये बारिश अगर बरस पड़ी

तो सब कुछ बहा ले जाएगी,

इसलिए वो ठहरी है,

सिर्फ़ तेरी साँसों में

महफ़ूज़ रहकर।


और मैं

इस अधूरी-सी बारिश में

पूरा भीगता रहता हूँ,

बिना किसी बूँद के,

सिर्फ़ तेरी गर्माहट से।


मुकेश ,,,,,,,

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