मुस्कुराहट के पीछे ठहरा हुआ दर्द

 मुस्कुराहट के पीछे ठहरा हुआ दर्द


मुस्कुराहट के पीछे

ठहरा हुआ दर्द

जैसे किसी ने

आँखों की दहलीज़ पर

आँसू रखकर

उन्हें गिरने से मना कर दिया हो।


होंठ हँसते हैं,

पर भीतर कहीं

एक सन्नाटा है

जो हर लफ़्ज़ के बाद

थोड़ा और गहरा हो जाता है।


लोग कहते हैं

“तुम ठीक लगते हो”,

और मैं सोचता हूँ

क्या ठीक होना

सिर्फ़ दिखने की चीज़ है?


तुम्हारे जाने के बाद

मैंने सीखा है

कैसे दर्द को

आदत की तरह पहनना है,

कैसे मुस्कुराहट को

एक परदा बनाना है।


ये जो ठहराव है

ये कोई सुकून नहीं,

ये वो जगह है

जहाँ दर्द

चलना छोड़ देता है,

और बस

रहना सीख जाता है।


कभी-कभी

आईने में खुद को देखकर

यूँ लगता है

जैसे मैं नहीं,

मेरी मुस्कुराहट जी रही है

और मैं

उसके पीछे कहीं

खो गया हूँ।


फिर भी…

ये मुस्कुराहट

झूठ नहीं है पूरी,

क्योंकि उसमें

तुम्हारी याद की

हल्की-सी गर्मी भी है


जो दर्द को

ज़िंदा रखती है,

और मुझे भी।


मुकेश ,,,,,,,

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