होम | रोज़नामचा | कविताएँ | कहानियाँ | विचार | ज्योतिष | लेखक

Sunday, 19 April 2026

ज्ञाननिष्ठा और कर्मनिष्ठा का उपनिषद्-सम्मत समन्वय — अष्टम मन्त्र की प्रस्तावना

 ज्ञाननिष्ठा और कर्मनिष्ठा का उपनिषद्-सम्मत समन्वय — अष्टम मन्त्र की प्रस्तावना

मूल पदांश (संशोधित रूप में)

अत्र आद्येन मन्त्रेण सर्वेषणा-परित्यागेन ज्ञाननिष्ठा उक्ता

“ईशावास्यमिदं सर्वं… मा गृधः कस्यस्विद्धनम्” इति।

अज्ञानानां जिजीविषूणां ज्ञाननिष्ठा-असंभवे

“कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेत्” इति कर्मनिष्ठा उक्ता द्वितीयः वेदार्थः।


यहाँ पहले मन्त्र में सब प्रकार की इच्छाओं का त्याग करके ज्ञानमार्ग (ज्ञाननिष्ठा) बताया गया है—“यह सब ईश्वर से आवृत है… किसी के धन की इच्छा मत करो।”

और जो अज्ञानी हैं तथा जीना चाहते हैं, उनके लिए ज्ञानमार्ग संभव न होने पर दूसरे मन्त्र में कर्ममार्ग बताया गया है“कर्म करते हुए ही जीने की इच्छा करनी चाहिए।”

यह भाष्यांश ईशावास्योपनिषद् के प्रारम्भिक दो मन्त्रों के आधार पर ज्ञानमार्ग और कर्ममार्ग की स्थापना करता है, और आगे आने वाले मन्त्रों—विशेषतः अष्टम मन्त्र—की व्याख्या के लिए एक दार्शनिक पृष्ठभूमि तैयार करता है।

शंकराचार्य के अनुसार, उपनिषद् का उद्देश्य एक ही है—आत्मज्ञान द्वारा मोक्ष।

किन्तु सभी साधक एक ही स्तर के नहीं होते; अतः उपनिषद् दो प्रकार की निष्ठाओं का प्रतिपादन करता है—

(1) ज्ञाननिष्ठा — प्रथम वेदार्थ

“ईशावास्यमिदं सर्वं…”—इस मन्त्र में यह सिखाया गया है कि सम्पूर्ण जगत् ईश्वर से व्याप्त है।

अतः “मा गृधः”—किसी वस्तु के प्रति लोभ मत करो।

यहाँ “सर्वेषणा-परित्याग” का अर्थ है


पुत्रेषणा (संतान की इच्छा)

वित्तेषणा (धन की इच्छा)

लोकेषणा (यश-प्रतिष्ठा की इच्छा)

इन सबका त्याग करके साधक आत्मज्ञान में स्थित (ज्ञाननिष्ठ) होता है।

यह मार्ग उन लोगों के लिए है जो

वैराग्ययुक्त हैं

विवेकशील हैं

और सत्य की खोज में तत्पर हैं

इसी को शंकराचार्य “प्रथम वेदार्थ” कहते हैं—अर्थात् उपनिषद् का मुख्य और परम उद्देश्य।

(2) कर्मनिष्ठा — द्वितीय वेदार्थ

अब शंकराचार्य कहते हैं

“अज्ञानानां जिजीविषूणां”—जो अभी अज्ञानी हैं और संसार में जीने की इच्छा रखते हैं।


ऐसे लोगों के लिए ज्ञानमार्ग तुरंत संभव नहीं होता।

इसलिए उपनिषद् दूसरे मन्त्र में कहता है

“कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेत्”

कर्म करते हुए ही जीने की इच्छा करनी चाहिए।


यह कर्मनिष्ठा उन साधकों के लिए है

जिनमें अभी वैराग्य पूर्ण नहीं है

जो संसार में रहते हुए धीरे-धीरे शुद्धि प्राप्त करना चाहते हैं

यहाँ कर्म का उद्देश्य मोक्ष नहीं, बल्कि चित्तशुद्धि (mind purification) है,

जो आगे चलकर ज्ञान के लिए पात्रता उत्पन्न करता है।

समन्वय और आगे की भूमिका

इस प्रकार, उपनिषद् दो मार्गों का प्रतिपादन करता है—

ज्ञानमार्ग — सीधे मोक्ष का साधन

कर्ममार्ग — ज्ञान के लिए तैयारी


अब अष्टम मन्त्र में जो ब्रह्म का स्वरूप बताया जा रहा है—

वह मुख्यतः ज्ञाननिष्ठ साधक के लिए है,

जो पहले ही मोह, शोक और संसार के बंधनों से मुक्त हो चुका है।

अतः यह भूमिका यह स्पष्ट करती है कि

अष्टम मन्त्र का विषय “ब्रह्मस्वरूप” है, जो केवल ज्ञाननिष्ठ के लिए प्रत्यक्ष है, न कि कर्मनिष्ठ के लिए।

इस भाष्यांश में शंकराचार्य ने उपनिषद् के प्रारम्भिक दो मन्त्रों के आधार पर ज्ञानमार्ग और कर्ममार्ग का स्पष्ट भेद किया है। ज्ञाननिष्ठा उपनिषद् का मुख्य उद्देश्य है, जबकि कर्मनिष्ठा अज्ञानियों के लिए एक साधन मात्र है। इस प्रकार, यह भूमिका अष्टम मन्त्र में वर्णित ब्रह्मस्वरूप की व्याख्या के लिए साधक को तैयार करती है।


मुकेश ,,,,,,,,,,,,,

No comments:

Post a Comment