ज्ञान–कर्म निष्ठाओं का विभाग — उपनिषद्-सम्मत द्विविध मार्ग (अष्टम मन्त्र-भूमिका)
मूल पदांश (संशोधित रूप में)
अनयोः च निष्ठयोः विभागः मन्त्रदृष्ट्योः च बृहदारण्यकेऽपि प्रदर्शितः।
“सः अकामयत—जाया मे स्यात्…” इत्यादिना अज्ञानिनः (कर्मनिष्ठा),
तथा “आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः…” इत्यादिना ज्ञानिनः (ज्ञाननिष्ठा) इति।
इन दोनों निष्ठाओं—ज्ञान और कर्म—का भेद बृहदारण्यक उपनिषद् में भी स्पष्ट किया गया है।
“उसने इच्छा की—मेरी पत्नी हो…” आदि वचनों से अज्ञानियों के लिए कर्ममार्ग बताया गया है,
और “आत्मा का दर्शन करना चाहिए…” आदि वचनों से ज्ञानमार्ग का उपदेश किया गया है।
यह भाष्यांश ईशावास्योपनिषद् में प्रतिपादित ज्ञाननिष्ठा और कर्मनिष्ठा के द्वैत को और अधिक प्रामाणिक बनाने के लिए बृहदारण्यक उपनिषद् का प्रमाण प्रस्तुत करता है। शंकराचार्य का उद्देश्य यह दिखाना है कि यह द्विविध निष्ठा कोई नवीन सिद्धांत नहीं, बल्कि समस्त उपनिषदों में समान रूप से स्वीकृत है।
“अनयोः च निष्ठयोः विभागः” -यहाँ “अनयोः” से अभिप्राय है
(1) ज्ञाननिष्ठा (आत्मज्ञान में स्थित होना)
(2) कर्मनिष्ठा (कर्म के माध्यम से जीवन यापन)
शंकराचार्य कहते हैं कि इन दोनों का विभाग केवल ईशावास्योपनिषद् में ही नहीं, बल्कि बृहदारण्यक उपनिषद् में भी स्पष्ट रूप से दिखाया गया है।
अब वे दो उदाहरण देते हैं
(1) “सः अकामयत—जाया मे स्यात्…”
यह वचन उस स्थिति को दर्शाता है जहाँ जीव में कामना (desire) उत्पन्न होती है,“मेरी पत्नी हो, संतान हो…” इत्यादि।
यह अवस्था अज्ञान की है, क्योंकि यहाँ जीव स्वयं को सीमित मानकर बाह्य वस्तुओं में सुख खोजता है।
इसी कामना से कर्म उत्पन्न होता है, और कर्म से संसार-चक्र चलता है।
अतः यह वचन कर्मनिष्ठा का प्रतिनिधित्व करता है,जहाँ जीव अपनी इच्छाओं की पूर्ति के लिए कर्म करता है।
(2) “आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः…”यह वचन पूर्णतः भिन्न दृष्टि प्रस्तुत करता है।
यहाँ कहा गया है कि आत्मा को देखना, सुनना, मनन करना और ध्यान करना चाहिए।
यह ज्ञानमार्ग का प्रतिपादन है,
जहाँ साधक बाह्य वस्तुओं को छोड़कर आत्मा की ओर उन्मुख होता है।
यहाँ कामना का स्थान नहीं, बल्कि विवेक और वैराग्य का स्थान है।
इन दोनों वचनों के माध्यम से शंकराचार्य यह सिद्ध करते हैं कि—
कामना से प्रेरित जीवन (कर्ममार्ग) और
ज्ञान की ओर उन्मुख जीवन (ज्ञानमार्ग)
दोनों उपनिषदों में स्पष्ट रूप से पृथक-पृथक माने गए हैं।
यहाँ एक महत्वपूर्ण बात यह है कि—
ये दोनों मार्ग एक साथ नहीं चल सकते।
क्योंकि,
कर्ममार्ग कामना पर आधारित है
और ज्ञानमार्ग कामना के त्याग पर
अतः शंकराचार्य के अनुसार,
कर्मनिष्ठा केवल ज्ञान के लिए तैयारी (अधिकार-निर्माण) है,
जबकि ज्ञाननिष्ठा ही मोक्ष का प्रत्यक्ष साधन है।
अष्टम मन्त्र की भूमिका
इस प्रकार, यह भाष्यांश यह स्पष्ट करता है कि
अष्टम मन्त्र में जो ब्रह्म का स्वरूप वर्णित होने वाला है,
वह केवल ज्ञाननिष्ठ साधक के लिए है,
जिसने कामना और कर्म दोनों का अतिक्रमण कर लिया है।
अतः यह भूमिका साधक को यह समझाने के लिए है कि
अब जो तत्त्व बताया जाएगा, वह परमार्थदृष्टि से है, न कि व्यवहारदृष्टि से।
इस भाष्यांश में शंकराचार्य ने बृहदारण्यक उपनिषद् के उदाहरणों द्वारा यह सिद्ध किया है कि ज्ञाननिष्ठा और कर्मनिष्ठा दो भिन्न मार्ग हैं। कर्ममार्ग अज्ञान और कामना पर आधारित है, जबकि ज्ञानमार्ग आत्मदर्शन की ओर ले जाता है। इस प्रकार, अष्टम मन्त्र की व्याख्या के पूर्व यह भूमिका यह स्पष्ट करती है कि ब्रह्मस्वरूप का ज्ञान केवल उसी साधक के लिए संभव है, जो ज्ञाननिष्ठा को प्राप्त हो चुका है।
मुकेश ,,,,,,,,,,,
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