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Sunday, 19 April 2026

ज्ञाननिष्ठा का फल — असंगता द्वारा आत्मस्वरूप में प्रतिष्ठा

 ज्ञाननिष्ठा का फल — असंगता द्वारा आत्मस्वरूप में प्रतिष्ठा

मूल पदांश (संशोधित रूप में)

तथा च तत् फलम् असङ्गः; तेषु आसक्त्यभावेन आत्मस्वरूप-अवस्थानम्।

और उस (ज्ञाननिष्ठा) का फल है—असंगता।

अर्थात् उन (सभी भूतों/वस्तुओं) में आसक्ति के अभाव से आत्मा के अपने स्वरूप में स्थित हो जाना।

यह भाष्यांश ज्ञानमार्ग की चरम परिणति को सूचित करता है। शंकराचार्य यहाँ यह स्पष्ट करते हैं कि आत्मज्ञान केवल बौद्धिक समझ नहीं, बल्कि एक ऐसी अवस्था है जिसका प्रत्यक्ष फल असंगता (non-attachment) है।

“तथा च तत् फलम्”—अर्थात् पूर्वोक्त ज्ञाननिष्ठा का जो फल है, वह अब बताया जा रहा है।

वह फल है—असङ्गः।

“असंग” का अर्थ है—किसी भी वस्तु, व्यक्ति, या अनुभव के साथ चिपकाव (attachment) का अभाव।

यह विरक्ति (detachment) कृत्रिम नहीं, बल्कि ज्ञान का स्वाभाविक परिणाम है।

क्योंकि जब साधक यह जान लेता है कि

“सर्वं आत्मा एव”—सब कुछ आत्मा ही है,

तब “अन्य” का विचार समाप्त हो जाता है।

अब जब “अन्य” नहीं रहा, तो—

न किसी को पाने की इच्छा रहती है

न किसी के खोने का भय

न राग, न द्वेष

इसी को कहा गया—“तेषु आसक्त्यभावेन”

उन सब भूतों (जगत् की वस्तुओं) में आसक्ति का अभाव।

यहाँ “असंगता” का अर्थ यह नहीं कि ज्ञानी संसार को त्याग देता है या उससे भाग जाता है,

बल्कि वह भीतर से स्वतंत्र हो जाता है।

अब अगला महत्वपूर्ण पद है

“आत्मस्वरूप-अवस्थानम्”।

अर्थात्—अपने वास्तविक स्वरूप में स्थित हो जाना।

यह अद्वैत वेदान्त का अंतिम लक्ष्य है

आत्मा में ही स्थित होना, न कि किसी बाह्य वस्तु में।

अविद्या के कारण जीव स्वयं को शरीर-मन से जोड़ लेता है और अपने वास्तविक स्वरूप को भूल जाता है।

परंतु ज्ञान के द्वारा वह पुनः अपने शुद्ध, चैतन्यस्वरूप में स्थित हो जाता है।


यह स्थिति किसी नई उपलब्धि (achievement) की नहीं है,

बल्कि स्वरूप-प्रत्यावर्तन (return to one’s own nature) की है।

एक दृष्टांत से इसे समझा जा सकता है—

जैसे कोई व्यक्ति स्वप्न में अपने को सीमित मान लेता है,

परंतु जागने पर अपने वास्तविक स्वरूप को पहचान लेता है;

उसी प्रकार, आत्मज्ञान से जीव अपने वास्तविक स्वरूप में स्थित हो जाता है।

इस प्रकार, असंगता और आत्मस्वरूप में स्थित होना—ये दोनों एक ही प्रक्रिया के दो पक्ष हैं।

इस भाष्यांश में शंकराचार्य ने ज्ञाननिष्ठा के फल को “असंगता” के रूप में प्रस्तुत किया है। जब साधक सबमें आत्मा का दर्शन करता है, तब उसमें आसक्ति का अभाव हो जाता है और वह अपने वास्तविक स्वरूप में स्थित हो जाता है। यही आत्मज्ञान की चरम अवस्था है और अद्वैत वेदान्त का परम लक्ष्य।


मुकेश ,,,,,,,,,,,,,,,,,

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