एषणात्रय-संन्यास और आत्मनिष्ठा — आत्मविदों की कर्मातीत स्थिति (अष्टम मन्त्र-भूमिका)
मूल पदांश (संशोधित रूप में)
जायाद्येषणा-त्रय-संन्यासेन च आत्मविदां कर्मनिष्ठा-अप्रातिकूल्येन आत्मस्वरूप-निष्ठा एव दर्शिता—
“किं प्रजया करिष्यामः, येषां नोऽयम् आत्मायं लोकः” इत्यादिना।
पत्नी आदि (जाया), धन और लोक—इन तीन इच्छाओं (एषणाओं) का त्याग करके आत्मज्ञानी पुरुषों के लिए कर्ममार्ग बाधक नहीं रहता, और वे आत्मस्वरूप में ही स्थित रहते हैं।
इस बात को “हम प्रजा (संतान) से क्या करेंगे, जिनके लिए यह आत्मा ही सब कुछ है” आदि वचनों द्वारा बताया गया है।
यह भाष्यांश आत्मज्ञान प्राप्त साधक—आत्मविद्—की स्थिति का सूक्ष्म निरूपण करता है। शंकराचार्य यहाँ यह स्पष्ट करते हैं कि जब साधक एषणात्रय का त्याग कर देता है, तब वह स्वाभाविक रूप से आत्मस्वरूप-निष्ठ हो जाता है।
“जायाद्येषणा-त्रय”,यहाँ तीन प्रकार की मूल इच्छाओं (एषणाओं) का उल्लेख है,
जायेषणा — पत्नी, परिवार, संबंधों की इच्छा
वित्तेषणा — धन, संपत्ति की इच्छा
लोकेषणा — यश, प्रतिष्ठा या स्वर्ग की इच्छा
ये तीनों एषणाएँ संसार-बन्धन के मूल कारण हैं।
इन्हीं के कारण मनुष्य कर्म करता है और कर्म के द्वारा पुनर्जन्म के चक्र में फँसता है।
अब शंकराचार्य कहते हैं
“एषणात्रय-संन्यासेन”—इन तीनों इच्छाओं का पूर्ण त्याग।
यह त्याग केवल बाह्य नहीं, बल्कि आन्तरिक वैराग्य है—
जहाँ साधक के भीतर इन इच्छाओं का बीज भी शेष नहीं रहता।
ऐसे आत्मविद् के लिए
“कर्मनिष्ठा-अप्रातिकूल्येन”
कर्मनिष्ठा अब बाधक नहीं रहती।
अर्थात्
वह चाहे कर्म करे या न करे, उससे कोई बंधन उत्पन्न नहीं होता,
क्योंकि उसके कर्म अब अहंकार और फलासक्ति से रहित होते हैं।
इसलिए उसकी स्थिति है,“आत्मस्वरूप-निष्ठा”
वह निरंतर अपने आत्मस्वरूप में स्थित रहता है।
अब शंकराचार्य इस स्थिति को प्रमाणित करने के लिए श्रुति का उदाहरण देते हैं
“किं प्रजया करिष्यामः…”
इस वचन का अर्थ है,“हम संतान से क्या करेंगे, जिनके लिए यह आत्मा ही सब कुछ है?”
यहाँ आत्मविद् की दृष्टि स्पष्ट होती है
उसके लिए बाह्य वस्तुएँ (संतान, धन, यश) निरर्थक हो जाती हैं,
क्योंकि उसने उस परम तत्त्व को प्राप्त कर लिया है, जो सबका आधार है।
यहाँ एक गूढ़ अद्वैत सिद्धांत प्रकट होता है
जब पूर्ण की प्राप्ति हो जाती है, तब अपूर्ण की इच्छा स्वतः समाप्त हो जाती है।
एक दृष्टांत से इसे समझा जा सकता है
जैसे कोई व्यक्ति समुद्र तक पहुँच जाए, तो वह छोटे-छोटे जलस्रोतों की इच्छा नहीं करता;
उसी प्रकार, आत्मविद् के लिए संसार की सभी इच्छाएँ तुच्छ हो जाती हैं।
इस प्रकार, यह भाष्यांश यह सिद्ध करता है कि ज्ञान की परिपक्व अवस्था में संन्यास स्वाभाविक हो जाता है, और साधक आत्मा में स्थित रहता है।
इस भाष्यांश में शंकराचार्य ने एषणात्रय के त्याग के माध्यम से आत्मविद् की स्थिति का वर्णन किया है। जब साधक पत्नी, धन और लोक की इच्छाओं का त्याग करता है, तब वह कर्म के बंधनों से मुक्त होकर आत्मस्वरूप में स्थित हो जाता है। “किं प्रजया करिष्यामः…” आदि श्रुति वचन इस सत्य की पुष्टि करते हैं। यही अवस्था अद्वैत वेदान्त में परम साध्य मानी गई है।
मुकेश ,,,,,,,,,,,,
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