संन्यासी ज्ञाननिष्ठ की परम अवस्था — आत्मयाथात्म्य के उपदेश की उपनिषद्-परम्परा
मूल पदांश (संशोधित रूप में)
ये तु ज्ञाननिष्ठाः संन्यासिनः, तेभ्यः “असुर्या नाम ते लोकाः…” इत्यादिना विद्यानिन्दा-द्वारेण आत्मनः याथात्म्यं “सः पर्यगात्…” इत्येतदन्त-मन्त्ररूपेण उपदिष्टम्।
ते यत्र अधिगताः, न कामिनः इति।
तथा च श्वेताश्वतराणां मन्त्रोपनिषदि
“अत्याश्रमिभ्यः परमं पवित्रं प्रोवाच सम्यगृषिसंघजुष्टम्” इत्यादि विभज्य उक्तम्।
जो ज्ञाननिष्ठ संन्यासी हैं, उनके लिए “असुर्या नाम ते लोकाः…” आदि मन्त्रों से अविद्या और अज्ञान की निन्दा करते हुए आत्मा के यथार्थ स्वरूप का उपदेश “सः पर्यगात्…” तक के मन्त्रों में किया गया है।
जो इस अवस्था को प्राप्त हो जाते हैं, वे कामनारहित हो जाते हैं।
श्वेताश्वतर उपनिषद् में भी कहा गया है कि यह परम पवित्र ज्ञान उच्चतर आश्रम वालों को बताया गया है।
यह भाष्यांश अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसमें शंकराचार्य यह स्पष्ट करते हैं कि ईशावास्योपनिषद् के मध्यवर्ती मन्त्र—विशेषतः “असुर्या नाम ते लोकाः” से लेकर “सः पर्यगात्” तक—किसके लिए कहे गए हैं और उनका उद्देश्य क्या है।
प्रथम वाक्य,“ये तु ज्ञाननिष्ठाः संन्यासिनः”—
यहाँ स्पष्ट रूप से कहा गया है कि यह उपदेश उन लोगों के लिए है जो ज्ञाननिष्ठ संन्यासी हैं।
अर्थात्— जिन्होंने एषणात्रय का त्याग कर दिया है,
जो कर्ममार्ग से ऊपर उठ चुके हैं, और जिनका लक्ष्य केवल आत्मज्ञान है।
अब शंकराचार्य कहते हैं—
“असुर्या नाम ते लोकाः…” इत्यादिना विद्यानिन्दा-द्वारेण…”
यहाँ “विद्यानिन्दा” से आशय वास्तव में अविद्या और अज्ञान-प्रधान जीवन की निन्दा है।
“असुर्या नाम ते लोकाः” मन्त्र उन लोगों की स्थिति बताता है जो आत्मज्ञान से विमुख हैं और केवल कर्म तथा अज्ञान में रत हैं।
इस निन्दा का उद्देश्य भय उत्पन्न करना नहीं, बल्कि साधक को आत्ममार्ग की ओर मोड़ना है।
इसी के बाद उपनिषद् क्रमशः आत्मा के वास्तविक स्वरूप का निरूपण करता है—
“सः पर्यगात्…” आदि मन्त्रों द्वारा।
शंकराचार्य इसे कहते हैं
“आत्मनः याथात्म्यम्”
अर्थात् आत्मा का यथार्थ स्वरूप।
यही वह स्वरूप है जिसका हमने पिछले मन्त्रों में विवेचन किया
सर्वव्यापक
शुद्ध
अशरीर
सर्वज्ञ
स्वयम्भू
अब आगे कहा गया
“ते यत्र अधिगताः, न कामिनः” जो इस आत्मतत्त्व को प्राप्त कर लेते हैं, वे कामनारहित हो जाते हैं।
यहाँ “काम” केवल लौकिक इच्छा नहीं, बल्कि समस्त संसारगत आकर्षण का द्योतक है।
ज्ञान की सिद्धि के साथ कामनाएँ स्वतः शांत हो जाती हैं।
यह शंकराचार्य के अद्वैत का मूल सिद्धांत है
ज्ञान और कामना साथ नहीं रह सकते।
जहाँ अद्वैत का अनुभव है, वहाँ “अन्य” नहीं बचता;
और जहाँ “अन्य” नहीं, वहाँ इच्छा का विषय भी नहीं।
अंत में शंकराचार्य श्वेताश्वतर उपनिषद् का प्रमाण देते हैं,
यह दिखाने के लिए कि यह आत्मविद्या केवल ईशावास्योपनिषद् का सिद्धांत नहीं, बल्कि समस्त उपनिषद्-परम्परा में प्रतिष्ठित है।
“अत्याश्रमिभ्यः परमं पवित्रम्…”
अर्थात् यह परम पवित्र ज्ञान उन उच्चतम साधकों को दिया गया है, जिन्होंने आश्रमधर्म की परिपक्वता प्राप्त कर ली है।
यहाँ “अत्याश्रमि” का आशय मुख्यतः संन्यासी या परमहंस साधक से है।
इस भाष्यांश में शंकराचार्य स्पष्ट करते हैं कि “असुर्या नाम ते लोकाः” से “सः पर्यगात्” तक के मन्त्र ज्ञाननिष्ठ संन्यासियों के लिए हैं। इन मन्त्रों का उद्देश्य अज्ञान की निन्दा के माध्यम से आत्मा के यथार्थ स्वरूप का उपदेश करना है। इस ज्ञान को प्राप्त साधक कामनारहित होकर आत्मस्वरूप में स्थित हो जाता है। श्वेताश्वतर उपनिषद् का प्रमाण इस आत्मविद्या की सार्वोपनिषदिक प्रतिष्ठा को पुष्ट करता है।
मुकेश ,,,,,,,
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