कर्मनिष्ठ और ज्ञाननिष्ठ का भेद — “अन्धं तमः” मन्त्र का अधिकार-विचार
मूल पदांश (संशोधित रूप में)
ये तु कामिनः कर्मनिष्ठाः, कर्मणि एव इह जिजीविषवः, तेभ्यः इदं उच्यते— “अन्धं तमः…” इत्यादि।
कथं पुनः एवं अवगम्यते, न तु सर्वेषाम् इति?
जो लोग कामनायुक्त हैं और कर्म में ही जीने की इच्छा रखते हैं, उनके लिए “अन्धं तमः…” आदि मन्त्र कहे गए हैं।
पर यह कैसे जाना जाए कि ये उपदेश सबके लिए नहीं हैं, बल्कि केवल उन्हीं के लिए हैं?
यह भाष्यांश एक अत्यंत सूक्ष्म और महत्वपूर्ण प्रश्न को उठाता है,
क्या उपनिषद् के सभी मन्त्र सभी लोगों के लिए समान रूप से लागू होते हैं, या वे भिन्न-भिन्न साधकों के लिए अलग-अलग हैं?
शंकराचार्य पहले यह स्पष्ट करते हैं -“ये तु कामिनः कर्मनिष्ठाः…”
यहाँ “कामिनः” से अभिप्राय है—वे लोग जिनमें अभी भी इच्छाएँ (कामना) विद्यमान हैं।
और “कर्मनिष्ठाः”—जो कर्ममार्ग में स्थित हैं, अर्थात्,यज्ञ, दान, तप आदि में प्रवृत्त,और उन्हीं के द्वारा जीवन (जिजीविषा) को सार्थक मानते हैं
“कर्मणि एव इह जिजीविषवः”
जो इस संसार में केवल कर्म करते हुए ही जीना चाहते हैं।
ऐसे लोगों के लिए ही उपनिषद् कहता है,
“अन्धं तमः प्रविशन्ति…”
यह मन्त्र उन लोगों की स्थिति को दर्शाता है जो केवल कर्म में ही लगे रहते हैं और आत्मज्ञान की ओर नहीं बढ़ते।
यह एक प्रकार की चेतावनी (warning) है,कि केवल कर्म से अंतिम मुक्ति संभव नहीं।
अब शंकराचार्य एक शंका उठाते हैं,“कथं पुनः एवं अवगम्यते, न तु सर्वेषाम् इति?”
अर्थात्, हम यह कैसे निश्चित करें कि यह उपदेश केवल कर्मनिष्ठों के लिए है, न कि सभी के लिए?
यह प्रश्न इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यदि ये मन्त्र सबके लिए हों, तो ज्ञाननिष्ठ और कर्मनिष्ठ का भेद निरर्थक हो जाएगा।
शंकराचार्य का समाधान (जो आगे भाष्य में आता है) यह है कि—
श्रुति स्वयं प्रसंग (context), उपक्रम (beginning), उपसंहार (conclusion) और साधक की पात्रता (adhikāra) के आधार पर भेद करती है।
यहाँ भी प्रारम्भ में “ईशावास्यमिदं सर्वं” द्वारा ज्ञाननिष्ठा का उपदेश, फिर “कुर्वन्नेवेह कर्माणि” द्वारा कर्मनिष्ठा का निर्देश
और आगे “अन्धं तमः…” द्वारा कर्म में फँसे रहने की सीमा का निरूपण
यह क्रम स्वयं यह सिद्ध करता है कि—
उपनिषद् विभिन्न स्तर के साधकों के लिए भिन्न-भिन्न शिक्षाएँ देता है।
अतः यह मानना कि सभी मन्त्र सभी के लिए समान हैं—यह शास्त्र के अभिप्राय के विरुद्ध है।
एक दृष्टांत से इसे समझा जा सकता है
जैसे एक गुरु अलग-अलग छात्रों को उनकी क्षमता के अनुसार अलग-अलग निर्देश देता है,
वैसे ही उपनिषद् भी साधक की योग्यता के अनुसार मार्ग बताता है।
इस प्रकार, कर्मनिष्ठ के लिए “अन्धं तमः…” चेतावनी है
और ज्ञाननिष्ठ के लिए “सः पर्यगात्…” आत्मस्वरूप का प्रतिपादन
निष्कर्ष
इस भाष्यांश में शंकराचार्य यह स्पष्ट करते हैं कि “अन्धं तमः…” आदि मन्त्र विशेष रूप से कर्मनिष्ठ, कामनायुक्त साधकों के लिए हैं। यह उपदेश सभी के लिए समान रूप से नहीं है, बल्कि साधक की पात्रता के अनुसार भिन्न-भिन्न है। इस प्रकार, उपनिषद् में ज्ञानमार्ग और कर्ममार्ग का स्पष्ट विभाजन सिद्ध होता है, जो अद्वैत वेदान्त की मूल आधारशिला है।
मुकेश ,,,,,,,,,,,
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