एकत्वविज्ञान की परम सिद्धि — कर्मातीत आत्मज्ञान का शांकरार्थ (नवम मन्त्र-भूमिका)
मूल पदांश (संशोधित रूप में)
उच्यते— अकामिनः साध्य-साधन-भेद-उपमर्देन यस्मिन् सर्वाणि भूतानि आत्मैव अभूत् विजानतः।
“तत्र को मोहः कः शोकः एकत्वम् अनुपश्यतः” इति।
यत् तद् एकत्व-विज्ञानं, तत् न केनचित् कर्मणा, न ज्ञानान्तरेण वा;
अमूढः सन् तु उच्छिच्छोषति (संसारं निवर्तयति)।
कहा जाता है कि जो अकाम (निष्काम) है, वह साध्य और साधन के भेद को मिटाकर सब भूतों को आत्मा ही जानता है।
ऐसे एकत्व को देखने वाले के लिए न मोह रहता है, न शोक।
यह जो एकत्व का ज्ञान है, वह न किसी कर्म से प्राप्त होता है, न किसी अन्य ज्ञान से;
जो अज्ञानरहित हो जाता है, वह संसार से मुक्त हो जाता है।
यह भाष्यांश ईशावास्योपनिषद् के नवम मन्त्र की प्रस्तावना के रूप में अत्यंत गूढ़ अद्वैत सिद्धांत को प्रस्तुत करता है। यहाँ शंकराचार्य यह स्पष्ट करते हैं कि आत्मज्ञान (एकत्वविज्ञान) ही परम साध्य है, और वह किसी भी कर्म या अन्य साधन से उत्पन्न नहीं होता।
प्रथम—“अकामिनः”।
यहाँ साधक की पात्रता बताई गई है, जो कामनारहित है, वही इस ज्ञान का अधिकारी है।
क्योंकि कामना ही भेद (duality) का कारण है—
जहाँ इच्छा है, वहाँ “मैं” और “अन्य” का विभाजन अनिवार्य है।
अब कहा गया “साध्य-साधन-भेद-उपमर्देन”।
सामान्यतः जीवन में हम साध्य (लक्ष्य) और साधन (उपाय) का भेद मानते हैं
जैसे धन प्राप्त करना साध्य है, और कर्म उसका साधन।
परंतु आत्मज्ञान में यह भेद समाप्त हो जाता है
क्योंकि आत्मा न तो प्राप्त करने योग्य कोई वस्तु है,न ही उसे पाने के लिए कोई बाहरी साधन है।
इसलिए शंकराचार्य कहते हैं
यहाँ साध्य और साधन दोनों का ही “उपमर्द” (निषेध) हो जाता है।
अब आगे— “यस्मिन् सर्वाणि भूतानि आत्मैव अभूत् विजानतः”
जिस ज्ञान में यह प्रत्यक्ष होता है कि,
सभी भूत (जीव, जगत्) वास्तव में आत्मा ही हैं।
यहाँ “अभूत्” का अर्थ है
वास्तव में वही आत्मा है, भिन्न नहीं।
इसी को आगे श्रुति के वचन से पुष्ट किया गया है
“तत्र को मोहः कः शोकः एकत्वम् अनुपश्यतः”
अर्थात्, जो एकत्व को देखता है, उसके लिए न मोह है, न शोक।
यहाँ “मोह” का अर्थ है—अज्ञानजन्य भ्रम,
और “शोक” का अर्थ है—हानि या दुःख की अनुभूति।
दोनों का मूल कारण है—द्वैत (भेद)।
जब यह भेद समाप्त हो जाता है, तो
न कोई खोता है
न कोई दुखी होता है
अब शंकराचार्य एक अत्यंत महत्वपूर्ण सिद्धांत प्रस्तुत करते हैं
“यत् तद् एकत्व-विज्ञानं, तत् न केनचित् कर्मणा…”
अर्थात् यह एकत्व का ज्ञान,किसी कर्म से उत्पन्न नहीं होता
न किसी अन्य प्रकार के ज्ञान (उपासनात्मक या बौद्धिक) से
क्यों?
क्योंकि कर्म सदैव परिवर्तनशील फल उत्पन्न करता है,जबकि आत्मा नित्य और अपरिवर्तनीय है।
इसलिए आत्मज्ञान कोई नया फल नहीं,बल्कि अविद्या का निवारण है।
“न ज्ञानान्तरेण”-यह भी महत्वपूर्ण है
यह ज्ञान किसी अन्य ज्ञान (जैसे इन्द्रियजन्य या तर्कजन्य ज्ञान) से भी भिन्न है।
यह स्वानुभव (self-realization) है।
अंत में, “अमूढः सन्…”
जो अज्ञान (मूढ़ता) से मुक्त हो जाता है,
वह संसार से मुक्त (उच्छिच्छोषति) हो जाता है।
यहाँ “उच्छिच्छोषति” का अर्थ है
संसाररूप दुःख का पूर्ण नाश।
इस भाष्यांश में शंकराचार्य ने आत्मज्ञान को परम साध्य के रूप में स्थापित किया है, जो साध्य-साधन भेद से परे है। यह ज्ञान न कर्म से प्राप्त होता है, न किसी अन्य माध्यम से, बल्कि अविद्या के निवारण से प्रकट होता है। एकत्व का अनुभव होने पर मोह और शोक का पूर्ण अभाव हो जाता है, और साधक संसार-बन्धन से मुक्त हो जाता है। यही अद्वैत वेदान्त की परम सिद्धि है।
मुकेश ,,,,,,,,,,,,
No comments:
Post a Comment