डीएनए में लिखी हुई प्रार्थना
शुरुआत में शब्द नहीं थे
सिर्फ़ एक रचना-क्रम था,
चार अक्षरों का मौन मंत्र
A, T, G, C
जिन्हें विज्ञान nucleotides कहता है,
और शायद सृष्टि
उन्हें अपनी पहली प्रार्थना।
हर कोशिका के गर्भ में
एक कुंडली मारे बैठा है
डीएनए
जैसे समय ने खुद को
दोहरी हेलिक्स में लपेट लिया हो,
ताकि भूल न जाए
कैसे रचनी है ज़िंदगी।
विज्ञान कहता है
यह केवल रासायनिक अनुक्रम है,
एक कोड,
जो प्रोटीन की भाषा में
शरीर को गढ़ता है।
पर अगर गहराई से सुनो,
तो हर अनुक्रम
एक विनती-सा लगता है
“मुझे आँख बनना है”,
“मुझे हृदय की धड़कन बनना है”,
“मुझे विचारों की चिंगारी बनना है…”
हर gene
जैसे कोई सूफ़ियाना बंदिश हो,
जो अपने समय पर खुलती है
न पहले, न बाद में।
डीएनए के इस शास्त्र में
कोई व्यर्थ शब्द नहीं,
हर अक्षर का अर्थ है,
हर क्रम का एक उद्देश्य
जैसे ऋग्वेद की ऋचाएँ,
या किसी फकीर की धीमी दुआ।
जब कोशिका विभाजित होती है
replication के उस सूक्ष्म अनुष्ठान में,
तो यह प्रार्थना
खुद को दोहराती है,
एक से दो,
दो से अनेक
पर अर्थ वही रहता है।
कभी-कभी
एक अक्षर बदल जाता है
mutation
और प्रार्थना की ध्वनि
थोड़ी काँप जाती है,
कभी नया राग बनता है,
कभी असंगति।
ऋषियों ने कहा
“शब्द ही ब्रह्म है”
और विज्ञान कहता है
“कोड ही जीवन है”
शायद दोनों
एक ही सत्य के
दो अलग उच्चारण हैं।
डीएनए
वह ग्रंथ है
जो बिना आवाज़ के पढ़ा जाता है,
जिसमें न स्याही है, न काग़ज़,
फिर भी हर शरीर
उसकी प्रतिलिपि है।
और उस ग्रंथ के हर पन्ने पर
एक ही प्रार्थना लिखी है
कि जीवन
जारी रहे…
कि रचना
कभी रुके नहीं…
कि एक कोशिका से उठी हुई
यह धीमी-सी दुआ
पूरे ब्रहांड में
धड़कन बनकर फैलती रहे।
और शायद…
जब हम प्रार्थना करते हैं,
तो हमारे शब्द नहीं,
हमारा डीएनए ही
उस प्राचीन दुआ को
फिर से दोहरा रहा होता है।
मुकेश ,,,,,,,,,,
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