एक रात
मैंने सपना देखा
कि पूरी दुनिया
एक बंद पड़े कारख़ाने की तरह
खामोश हो गई है।
गगनचुंबी इमारतों की खिड़कियों में
अब कोई रोशनी नहीं थी,
और शेयर बाज़ार की स्क्रीन पर
सिर्फ़ एक शब्द चमक रहा था —
“शून्य”।
सड़कें
लक्ज़री कारों से भरी थीं,
मगर उन्हें चलाने वाला
कोई नहीं बचा था।
अंत में
सिर्फ़ स्टीव जॉब्स बचा था।
वह
एक खाली ऑडिटोरियम के मंच पर
काले टर्टलनेक में खड़ा
अपनी हथेली में
एक बुझा हुआ फ़ोन लिए हुए था।
दुनिया जल रही थी,
मगर उसकी आँखों में
अब भी
किसी अधूरे विचार की चमक थी।
मैंने उससे पूछा —
“क्या तकनीक मनुष्य को बचा पाएगी?”
स्टीव जॉब्स ने
धीरे से उस काले स्क्रीन वाले फ़ोन को देखा
जिसमें अब
कोई नोटिफ़िकेशन नहीं आ रहा था।
फिर कहा —
“तकनीक
मनुष्य को जोड़ती कम है,
उसके खालीपन को
ज़्यादा सुंदर बना देती है…”
इतना कहकर
उसने फ़ोन बंद कर दिया।
और उसी क्षण
पूरी पृथ्वी की स्क्रीनें
एक साथ अँधेरी हो गईं।
अंत में
सिर्फ़ एक हल्की नीली रोशनी बची रही
जो धीरे-धीरे
किसी मरती हुई स्मृति की तरह
बुझती जा रही थी।
— मुकेश
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