एक रात
मैंने सपना देखा
कि दुनिया के सारे राष्ट्राध्यक्ष
एक ही गोल मेज़ पर इकट्ठा हो गए हैं।
उनके सामने
देशों के नक़्शे थे,
पर सीमाएँ
धीरे-धीरे पिघल रही थीं।
सभागार के बाहर
पूरा विश्व जल रहा था
समुद्र धुएँ से भर चुके थे,
बच्चे
खाली कटोरियाँ लिए सो गए थे,
और शहर
अपनी ही राख में दबते जा रहे थे।
मगर भीतर
अब भी भाषण चल रहे थे।
हर नेता
मानवता की बात कर रहा था,
और हर वाक्य के पीछे
सत्ता की ठंडी गंध छुपी हुई थी।
अंत में
एक बूढ़ा सफ़ाईकर्मी बचा था
जो सभा ख़त्म होने के बाद
धीरे-धीरे कुर्सियाँ ठीक कर रहा था।
मैंने उससे पूछा
“क्या उन्होंने दुनिया बचाने का कोई रास्ता निकाला?”
उसने थकी हुई आँखों से
खाली मेज़ की तरफ़ देखा
जहाँ पानी के आधे भरे गिलास
अब भी रखे थे।
फिर बहुत धीमे स्वर में बोला
“वे दुनिया बचाना नहीं चाहते थे,
वे सिर्फ़
इतिहास में अपना नाम बचाना चाहते थे…”
इतना कहकर
उसने आख़िरी कुर्सी सीधी की
और सभागार की सारी बत्तियाँ बुझा दीं।
अँधेरे में
सिर्फ़ पृथ्वी का एक छोटा-सा ग्लोब बचा रहा
जो मेज़ पर
धीरे-धीरे घूम रहा था।
— मुकेश
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