एक रात
मैंने सपना देखा
कि दुनिया के सारे धर्मगुरु
एक ही पर्वत की चोटी पर
इकट्ठा हो गए हैं।
किसी के हाथ में
धर्मग्रंथ था,
किसी के पास
माला, तस्बीह, क्रॉस या ध्वज।
नीचे
पूरा संसार
अपने ही विश्वासों में जल रहा था।
मंदिरों की घंटियाँ,
मस्जिदों की अज़ानें,
गिरजाघरों की प्रार्थनाएँ,
और मठों का मौन
सब आपस में टकराकर
एक अजीब शोर में बदल गए थे।
पर्वत की चोटी पर
सभी गुरु
ईश्वर पर बोल रहे थे।
कोई कहता —
“वह प्रेम है।”
कोई कहता —
“वह न्याय है।”
कोई कहता —
“वह शून्य है।”
और कोई —
“वह सिर्फ़ हमारा है…”
बहुत देर तक
बहस चलती रही।
फिर अचानक
भीड़ के पीछे बैठा
एक छोटा-सा बच्चा उठकर खड़ा हुआ।
उसने धीरे से पूछा —
“अगर ईश्वर एक है
तो उसके नाम इतने बेचैन क्यों हैं?”
पूरा पर्वत
अचानक शांत हो गया।
धर्मग्रंथों के पन्ने
हवा में काँपने लगे,
और सभी धर्मगुरु
कुछ क्षणों के लिए
एक-दूसरे का चेहरा देखने लगे।
मगर किसी के पास
उस बच्चे के प्रश्न का उत्तर नहीं था।
तभी
पूर्व दिशा में
धीरे-धीरे सुबह होने लगी।
और पहली धूप में
सभी परछाइयाँ
एक जैसी दिखाई देने लगीं।
— मुकेश
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