“अस्तित्व की परछाइयाँ”
प्रथम खंड का समापन
एक रात
मैंने सपना देखा
कि पृथ्वी पर
अब कुछ भी शेष नहीं बचा।
न राष्ट्र,
न धर्म,
न बाज़ार,
न विचारधाराएँ।
दार्शनिकों की किताबें
धूल में बदल चुकी थीं,
वैज्ञानिकों के समीकरण
आकाश से मिट गए थे,
और इतिहास
अपनी ही स्मृति खो चुका था।
जिन शहरों में
कभी मनुष्य
अमर होने के सपने देखते थे,
वहाँ अब
सिर्फ़ हवा चल रही थी।
मैं बहुत देर तक
उस उजड़ी हुई दुनिया में
अकेला भटकता रहा।
फिर अचानक
एक पुराने खंडहर के भीतर
मुझे एक छोटा-सा दीपक दिखाई दिया।
उसके पास
न कोई ऋषि बैठा था,
न कोई सम्राट,
न कोई ईश्वर।
सिर्फ़ एक साधारण मनुष्य
चुपचाप बैठा था।
उसकी आँखों में
न ज्ञान का अहंकार था,
न मुक्ति की बेचैनी।
वह बस
अपनी हथेलियों से
उस छोटे-से दीपक को
हवा से बचा रहा था।
मैंने उससे पूछा —
“जब सब समाप्त हो चुका है
तो तुम इस आख़िरी लौ को
क्यों बचा रहे हो?”
उसने मेरी तरफ़ देखा।
उसकी आँखों में
इतनी गहरी शांति थी
कि मुझे लगा
शायद ब्रह्मांड का सारा शोर
वहीं आकर थम गया है।
फिर उसने धीरे से कहा —
“क्योंकि
अस्तित्व का अर्थ
दुनिया को जीत लेना नहीं,
अँधेरे के बीच
एक छोटी-सी रोशनी बचाए रखना है…”
इतना कहकर
उसने दीपक मेरी तरफ़ बढ़ा दिया।
और उसी क्षण
मुझे लगा
कि सारी परछाइयाँ
धीरे-धीरे
प्रकाश में बदल रही हैं।
— मुकेश
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