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Tuesday, 19 May 2026

एक दुसरे की भाषा सीखते हुए 1

 एक दुसरे की भाषा सीखते हुए 

1

अब उस कमरे में

कोई बहस नहीं होती।

घड़ी

पहले की तरह चलती है,

पर उसकी टिक-टिक में

अब किसी का इंतज़ार नहीं बचा।

टेबल पर रखा नमकदान

आज भी आधा भरा है 

जैसे किसी ने

जल्दी में उठकर कहा हो,

“अभी आता हूँ।”

2

वे लोग

जो बात करते-करते

अचानक चुप हो जाते थे,

अब कहीं नहीं हैं।

सिर्फ़ परदे हैं

जो शाम होते ही

हल्का-सा हिलते हैं,

मानो हवा नहीं,

कोई पुरानी आदत

अब भी कमरे में आती हो।

3

किताबें

अब भी वहीं रखी हैं,

कुछ खुली हुई,

कुछ उलटी पड़ी हुई।

बीच-बीच में

सूखे पत्ते दबे हैं 

जिन्हें शायद

किसी ने पढ़ते हुए

बिना सोचे रख दिया था,

जैसे लोग

अपने दुख रख देते हैं।

4

रात बहुत देर तक

सीढ़ियों पर बैठी रहती है।

ऊपर के कमरे से

अब कोई आवाज़ नहीं आती,

फिर भी लगता है

अभी दरवाज़ा खुलेगा

और कोई पूछेगा 

“तुम अभी तक जाग रहे हो?”

5

अब इस घर में

सिर्फ़ चीज़ें रहती हैं।

एक चश्मा,

पुराना रेडियो,

दो कप,

और दीवार पर टेढ़ी तस्वीर।

वे सब

धीरे-धीरे

एक-दूसरे की भाषा सीख रहे हैं।

मुकेश ,,,,,,,,

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