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Tuesday, 19 May 2026

किसी भूली हुई बात पर।


कभी-कभी
रसोई से
बर्तनों की बहुत हल्की आवाज़ आती है।

जबकि वहाँ
कोई नहीं होता।

शायद कुछ ध्वनियाँ
घर नहीं छोड़तीं,
वे खाली कमरों में
धीरे-धीरे रहती रहती हैं।


बरामदे में रखी कुर्सी पर
अब धूप बैठती है।

पहले वहाँ
एक आदमी बैठता था
जो हर आने-जाने वाले को
बहुत देर तक देखता रहता था।

धूप ने
उसकी जगह तो ले ली है,
आदत नहीं।


पुरानी अलमारी खोलो
तो एक गंध निकलती है 

थोड़ी बारिश,
थोड़ा समय,
और थोड़ी अनुपस्थिति।

कुछ कपड़े
अब भी ऐसे टंगे हैं
जैसे उनका मालिक
बस बाहर गया हो।


वे लोग
जो धीरे हँसते थे,
घर से सबसे पहले
वही गायब हुए।

अब हँसी
सिर्फ़ टीवी से आती है,
और तुरंत
दीवारों में खो जाती है।


रात के दो बजे
पूरा शहर
बहुत बूढ़ा लगता है।

सड़कें
अपनी आवाज़ें समेट लेती हैं,
और दूर कहीं
एक कुत्ता भौंकता है
जैसे किसी भूली हुई बात पर।

मुकेश # 9999678683 

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