एक दिन
अचानक
घर की सारी चीज़ों ने
अपनी जगह बदल ली।
कुर्सी
खिड़की के पास चली गई,
घड़ी
दीवार से उतरकर
मेज़ पर रखी मिली,
और आईना
पूरा दिन
उल्टा टँगा रहा।
सिर्फ़ मैं
अपनी जगह पर बैठा रहा
जैसे किसी पुराने नक्शे में
भूल गया कोई शहर।
रात को
रसोई से
बर्तनों की बहुत धीमी आवाज़ें आती रहीं।
लगता था
वे आपस में
हम लोगों के बारे में बात कर रहे हों।
नींद में
मैंने देखा
कि मेरी परछाईं
मुझसे अलग होकर
सीढ़ियाँ उतर रही है।
उसने पीछे मुड़कर नहीं देखा।
सुबह
दरवाज़े के बाहर
कीचड़ से भरे जूते पड़े थे,
हालाँकि रात भर
बारिश नहीं हुई थी।
मैंने उन्हें छुआ नहीं।
कुछ चीज़ें
समझ लेने के लिए नहीं,
सिर्फ़ धीरे-धीरे
अपने भीतर उतर जाने के लिए होती हैं।
और शायद
डर भी
एक तरह का दूसरा जीवन है
जिसे हम
अपने कमरे में
चुपचाप रहने देते हैं।
— मुकेश
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