“यह उस मनुष्य का रोज़नामचा है जो समय की दौड़ से थोड़ा बाहर खड़ा है और साधारण दिनों में असाधारण अर्थ खोजता है।”
भीगी हुई दोपहरें
कभी पूरी नहीं जातीं।
वे परदों, किताबों और मन के किसी कोने में लंबे समय तक नमी छोड़ जाती हैं।
— Mukesh
No comments:
Post a Comment