“यह उस मनुष्य का रोज़नामचा है जो समय की दौड़ से थोड़ा बाहर खड़ा है और साधारण दिनों में असाधारण अर्थ खोजता है।”
भीगी हुई दोपहरें
खिड़की पर बारिश टपकती रही, और भीतर एक पुराना नाम धीरे-धीरे भीगता रहा।
MUKESH,,,,,
No comments:
Post a Comment