“यह उस मनुष्य का रोज़नामचा है जो समय की दौड़ से थोड़ा बाहर खड़ा है और साधारण दिनों में असाधारण अर्थ खोजता है।”
समय के मलबे पर (5)
मैंने स्मृति को
छूना चाहा,
वह
रेत की तरह बिखर गई।
कुछ चीज़ें
सिर्फ़
दूर से ही जीवित रहती हैं।
मुकेश ,,,,
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