“यह उस मनुष्य का रोज़नामचा है जो समय की दौड़ से थोड़ा बाहर खड़ा है और साधारण दिनों में असाधारण अर्थ खोजता है।”
समय के मलबे पर (4 )
धूप
पुराने कमरे में
आज भी वैसे ही गिरती है।
सिर्फ़
उसे देखने वाली आँखें
अब पहले जैसी नहीं रहीं।
मुकेश ,,,,,,,,,,,,,
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