“यह उस मनुष्य का रोज़नामचा है जो समय की दौड़ से थोड़ा बाहर खड़ा है और साधारण दिनों में असाधारण अर्थ खोजता है।”
समय के मलबे पर
एक टूटी हुई सीढ़ी पर
अब भी
कदमों की आहट रखी है।
कोई
बहुत पहले गया था,
लेकिन
जाना पूरी तरह नहीं हुआ।
मुकेश ,,,,,,,,,
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