एक रात
मैंने सपना देखा
कि पृथ्वी पर
अब कोई मनुष्य नहीं बचा था।
सिर्फ़ उनकी आवाज़ें थीं
जो खाली इमारतों में
भटक रही थीं।
सड़कें
इतनी शांत थीं
कि दूर गिरती हुई धूल की आवाज़ भी
सुनाई दे रही थी।
अंत में
एक पुराना सिनेमाघर बचा था
जहाँ आख़िरी फ़िल्म चल रही थी।
परदे पर
बारिश हो रही थी,
एक स्त्री
धीरे-धीरे किसी स्टेशन से दूर जा रही थी,
और पीछे
कोई आदमी
उसे पुकार भी नहीं रहा था।
पूरे हॉल में
सिर्फ़ एक दर्शक बैठा था
जॉर्ज लुई बोर्खेस।
वह अपनी बंद होती आँखों से
परदे की तरफ़ देख रहा था
जैसे उसे पहले से पता हो
कि हर कहानी
आख़िरकार
भूल जाने के लिए ही जन्म लेती है।
मैंने उससे पूछा —
“क्या यह दुनिया की आख़िरी फ़िल्म है?”
उसने हल्की मुस्कान से कहा
“नहीं,
यह मनुष्य की स्मृति का आख़िरी दृश्य है…”
इतना कहकर
सिनेमाघर की बिजली चली गई।
और अँधेरे में
सिर्फ़ प्रोजेक्टर की गर्म गंध बची रही
जो धीरे-धीरे
समय में घुलती जा रही थी।
— मुकेश
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