एक रात
मैंने सपना देखा
कि पूरी दुनिया
एक विशाल अस्पताल में बदल गई है।
हर शहर में
लंबे सफ़ेद गलियारे थे,
जहाँ लोग
अपनी ही परछाइयों को
स्ट्रेचर पर लिए घूम रहे थे।
आकाश से
धीरे-धीरे राख गिर रही थी
और समुद्र
नींद में बड़बड़ा रहे थे।
अंत में
सिर्फ़ एक आदमी बचा था
फ़्रीडरिख़ नीत्शे।
वह
किसी उजड़े हुए चौराहे पर
टूटी हुई घड़ी के पास बैठा
एक मरे हुए घोड़े के माथे पर
हाथ फेर रहा था।
उसकी आँखों में
इतनी गहरी करुणा थी
कि पूरा विनाश
उसके सामने छोटा लगने लगा।
मैंने उससे पूछा —
“क्या मनुष्य सचमुच समाप्त हो चुका है?”
नीत्शे ने
धीरे से सिर उठाया
और धुएँ से भरे आकाश को देखते हुए कहा —
“मनुष्य
बहुत पहले मर चुका था,
सभ्यताएँ तो सिर्फ़
उसकी लाश ढो रही थीं…”
फिर अचानक
सारी इमारतें
बिना आवाज़ के गिरने लगीं।
और उस धूल में
नीत्शे की आकृति
धीरे-धीरे
एक प्रश्नचिह्न में बदल गई।
— मुकेश
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