एक रात
मैंने सपना देखा
कि पूरी पृथ्वी पर
अदालतें खुल गई हैं।
हर आदमी
कटघरे में खड़ा था,
मगर किसी पर
कोई आरोप नहीं था।
जजों की कुर्सियाँ खाली थीं,
क़ानून की किताबें
अपने आप जल रही थीं,
और गवाह
धीरे-धीरे गायब हो रहे थे।
शहर के बीचोंबीच
एक कैफ़े बचा था
जहाँ पीली रोशनी में
ज्याँ-पॉल सार्त्र
अकेले बैठे सिगरेट पी रहे थे।
बाहर
सभ्यता ढह रही थी,
भीतर
कॉफ़ी ठंडी हो चुकी थी।
मैंने उनसे पूछा —
“जब सब समाप्त हो रहा है
तो क्या कोई अर्थ बचता है?”
सार्त्र ने
खिड़की के बाहर देखते हुए कहा —
“अर्थ
कभी दुनिया में था ही नहीं।
मनुष्य
अपनी तन्हाई से डरकर
उसे गढ़ता रहा…”
इतना कहकर
उन्होंने ऐश-ट्रे में
आधी बुझी सिगरेट दबा दी।
और उसी क्षण
पूरा कैफ़े
धीरे-धीरे अँधेरे में डूब गया।
अंत में
सिर्फ़ धुएँ की एक पतली लकीर बची रही
जो छत तक जाकर
कहीं गायब हो गई।
— मुकेश
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