एक रात
मैंने सपना देखा
कि पूरी दुनिया
एक अंतहीन सुपरमार्केट में बदल गई है।
लोग
टूटे हुए ट्रॉलियों में
अपनी इच्छाएँ भर रहे थे,
और हर शेल्फ़ पर
“अर्थ”, “प्रेम”, “मुक्ति”
छूट के दामों में बिक रहे थे।
ऊपर लगे विशाल स्क्रीन पर
लगातार युद्ध चल रहा था,
मगर किसी की निगाह
वहाँ तक नहीं उठ रही थी।
अंत में
सिर्फ़ स्लावोय जिझेक बचा था।
वह
एस्केलेटर के पास खड़ा
बेतरतीब काग़ज़ों पर
कुछ नोट्स लिख रहा था,
जैसे दुनिया का पतन भी
उसके लिए
एक अधूरा व्याख्यान हो।
मैंने उससे पूछा —
“क्या मनुष्य अब भी स्वतंत्र है?”
जिझेक हँसा —
वैसी अजीब, थकी हुई हँसी
जिसमें व्यंग्य भी था
और निराशा भी।
फिर उसने कहा —
“सबसे बड़ा भ्रम यह है
कि लोग सोचते हैं
वे अपनी इच्छा से जी रहे हैं।
असल में
उनकी इच्छाएँ भी
किसी और ने लिखी हैं…”
इतना कहकर
उसने स्क्रीन की तरफ़ देखा
जहाँ आग में जलती पृथ्वी
एक विज्ञापन जैसी लग रही थी।
और तभी
पूरा सुपरमार्केट
धीरे-धीरे खाली होने लगा।
अंत में
सिर्फ़ शॉपिंग ट्रॉलियों की आवाज़ बची रही
जो दूर अँधेरे में
अपने आप चल रही थीं।
— मुकेश
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