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Monday, 18 May 2026

एक रात मैंने सपना देखा -7

 एक रात

मैंने सपना देखा

कि पूरी पृथ्वी
एक विशाल भूलभुलैया में बदल गई है।

हर रास्ता
किसी और रास्ते में खुलता था,
और हर दरवाज़े के पीछे
एक और बंद दरवाज़ा था।

लोग
अपनी ही तलाश में
सदियों से भटक रहे थे,
मगर किसी को
याद नहीं था
कि वे शुरू कहाँ से हुए थे।

अंत में
सिर्फ़ मिशेल फ़ूको बचा था।

वह
किसी परित्यक्त कारागार की छत पर खड़ा
दूर शहर की बुझती हुई बत्तियों को
ध्यान से देख रहा था।

नीचे
लाखों खाली कमरे थे
जहाँ कभी
मनुष्यों की इच्छाओं को
क़ैद किया गया था।

मैंने उससे पूछा 
“क्या सत्ता सचमुच समाप्त हो गई?”

फ़ूको ने
धीरे से मुस्कुराकर कहा 

“सत्ता कभी मरती नहीं।
वह बस
अपना चेहरा बदल लेती है।

कभी राजा बनकर,
कभी धर्म बनकर,
और अब
मनुष्य के भीतर बैठी हुई
उसकी अपनी निगरानी बनकर…”

इतना कहकर
उन्होंने जेब से एक छोटी टॉर्च निकाली
और भूलभुलैया की तरफ़ रोशनी डाली।

मगर वहाँ
कोई रास्ता नहीं था।

सिर्फ़ दीवारें थीं —
जो लगातार
मनुष्य के चारों ओर
ऊँची होती जा रही थीं।

मुकेश

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