एक रात
मैंने सपना देखा
कि पूरी पृथ्वी
एक विशाल सोशल नेटवर्क में बदल गई है।
लोग
एक-दूसरे से जुड़े हुए थे,
मगर कोई
किसी को छू नहीं पा रहा था।
हर चेहरे पर
एक मुस्कान अपलोड थी,
और हर आत्मा के भीतर
धीरे-धीरे अँधेरा डाउनलोड हो रहा था।
शहरों के ऊपर
विशाल स्क्रीनें चमक रही थीं
जहाँ लोग
अपने अकेलेपन को
“स्टेटस” की तरह लिख रहे थे।
अंत में
सिर्फ़ ज़िग्मुंट बॉमन बचा था।
वह
किसी खाली मेट्रो स्टेशन पर
धीरे-धीरे टहल रहा था,
जैसे रिश्तों की टूटती हुई आवाज़ें
अब भी सुन पा रहा हो।
मैंने उससे पूछा —
“क्या प्रेम भी समाप्त हो गया?”
बॉमन ने
कुछ देर चुप रहकर
रेल की अँधेरी सुरंग की तरफ़ देखा।
फिर कहा —
“प्रेम समाप्त नहीं हुआ,
बस तरल हो गया है।
अब लोग
रिश्तों में नहीं रहते,
वे सिर्फ़
थोड़ी देर के लिए
एक-दूसरे की स्क्रीन पर दिखाई देते हैं…”
इतना कहकर
वह प्लेटफ़ॉर्म की आख़िरी बेंच पर बैठ गया।
और तभी
पूरे स्टेशन की रोशनी
एक-एक करके बुझने लगी।
अंत में
सिर्फ़ मोबाइल स्क्रीन की हल्की चमक बची रही
जिसमें
मनुष्य अपनी ही अनुपस्थिति पढ़ रहा था।
— मुकेश
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