एक रात
मैंने सपना देखा
कि पूरी दुनिया का बाज़ार
अचानक बंद हो गया है।
स्टॉक एक्सचेंज की विशाल स्क्रीनें
काली पड़ चुकी थीं,
और मुद्राएँ
सूखे पत्तों की तरह
सड़कों पर उड़ रही थीं।
लोग
अपनी जेबों में भरी दौलत लेकर
रोटी खोज रहे थे,
मगर दुकानों में
अब सिर्फ़ सन्नाटा बिक रहा था।
अंत में
सिर्फ़ कार्ल मार्क्स बचा था।
वह
किसी पुराने कारख़ाने की टूटी सीढ़ियों पर बैठा
धीरे-धीरे धुएँ में घुलते शहर को
देख रहा था।
उसके पास
एक जंग लगी मशीन थी
जो अब भी
अपने आप चल रही थी,
जैसे श्रम की स्मृति
मृत्यु के बाद भी समाप्त न हुई हो।
मैंने उससे पूछा
“क्या पूँजी आख़िरकार हार गई?”
मार्क्स ने
अपनी भारी आँखों से
भीड़ की तरफ़ देखा
जो अब भी
कुछ खरीदने की कोशिश कर रही थी।
फिर बहुत धीमे स्वर में कहा
“पूँजी
कभी वस्तुओं में नहीं रहती।
वह मनुष्य की इच्छाओं में छिप जाती है।
और जब तक
इच्छाएँ बिकती रहेंगी,
दुनिया
अपनी ही आत्मा का व्यापार करती रहेगी…”
इतना कहकर
उन्होंने अपनी पुरानी किताब बंद कर दी।
और उसी क्षण
पूरे शहर की बिजली चली गई।
अँधेरे में
सिर्फ़ मशीन की धीमी आवाज़ बची रही
जो किसी अदृश्य फ़ैक्टरी में
अब भी काम कर रही थी।
— मुकेश
No comments:
Post a Comment