एक बहुत बोझिल-सी जब शाम उतर आई
सूने दिल में यादों का कोहराम उतर आई
रात की चादर ने जब मुझको घेरा तो
ख़्वाब की आँखों में फिर नाकाम उतर आई
तेरे जाने से जो वीराना बसा दिल में
उसमें हर सूरत तेरी हर गाम उतर आई
हमने चाहा था कि हँसते ही रहें हरदम
आँख भीगी तो हँसी गुमनाम उतर आई
शहर की रौनक में तन्हा-सा खड़ा था मैं
भीड़ के चेहरे पे भी इक शाम उतर आई
दिन भर अपने ही ख़यालों से उलझता रहा
रात आई तो थकन बेहिसाब उतर आई
नाम अपना भी किसी मोड़ पे खो बैठा मैं
याद आई तो कोई इल्ज़ाम उतर आई
मुकेश ,,,,
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