रात मिली तन्हाई मिली, इक जाम मिला
घर से निकले तो हर इक गाम अंजाम मिला
एक बहुत बोझिल-सी जब शाम उतर आई
सूने दिल को यादों का कोहराम मिला
वही मोहल्ला, वही घर, वही चौखट लेकिन
दर पे देखा तो किसी और का नाम मिला
दिन भर दौड़े रोटी की ख़ातिर हम लेकिन
बेकारी में खुद से ही इक काम मिला
आईनों में ढूँढा जब अपना ही चेहरा
हर सूरत में टूटा हुआ अंजाम मिला
लोग मिले तो सिर्फ़ दिलासा ही बाँटा
दर्द टटोला तो सच्चा पैग़ाम मिला
लिखते-लिखते उम्र की स्याही सूख गई
नाम न आया फिर भी सुकून-ए-काम मिला
मुकेश ,,,,,,,,,,,,
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