वहाँ आग कम थी, धुआँ ही ज़्यादा था
हर इक चेहरा यहाँ आधा-आधा था
जो सच था, उसे किसने देखा भला
यहाँ झूठ का शोर भी ज़्यादा था
हमारी ख़ामोशी को इल्ज़ाम मिला
हर इक फ़ैसला भी यहाँ आधा था
किसी ने न पूछा कि दिल पर क्या गुज़री
हर इक दर्द का ज़िक्र भी आधा था
उजाले की बातें बहुत थीं मगर
हर इक घर में बस धुआँ ही ज़्यादा था
मक़्ता:
मुकेश इलाहाबादी ये कैसा शहर था
हर इक आदमी भी यहाँ आधा था
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