सब तो दरिया थे हम ही सराब निकले
अपने ही दिल से कितने अज़ाब निकले
जिसको चाहा था उम्र भर अपना
वो ही रिश्ते में बेहिसाब निकले
आईनों से नज़र मिलाते रहे
ख़ुद ही अपने से हम नक़ाब निकले
हर तरफ़ रौशनी का दावा था
हम ही अंदर से बे-चिराग़ निकले
वक़्त ने जब भी सच दिखाया हमें
हम ही अपने ही सवाल-ओ-जवाब निकले
न कोई और था गुनहगार यहाँ
हम ही अपने लिए ख़राब निकले
मक़्ता:
मुकेश इलाहाबादी ये राज़ खुला आख़िर
हम ही अपने ही किस्सों की किताब निकले
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