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Saturday, 2 May 2026

सब तो दरिया थे हम ही सराब निकले

 सब तो दरिया थे हम ही सराब निकले

अपने ही दिल से कितने अज़ाब निकले

जिसको चाहा था उम्र भर अपना
वो ही रिश्ते में बेहिसाब निकले

आईनों से नज़र मिलाते रहे
ख़ुद ही अपने से हम नक़ाब निकले

हर तरफ़ रौशनी का दावा था
हम ही अंदर से बे-चिराग़ निकले

वक़्त ने जब भी सच दिखाया हमें
हम ही अपने ही सवाल-ओ-जवाब निकले

न कोई और था गुनहगार यहाँ
हम ही अपने लिए ख़राब निकले

मक़्ता:
मुकेश इलाहाबादी ये राज़ खुला आख़िर
हम ही अपने ही किस्सों की किताब निकले

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