लोग तो अच्छे थे हम ही ख़राब निकले
अपने ही अंदर से हम ही अज़ाब निकले
हर क़दम पर खुद से ही लड़ते रहे हम
हम अपने ही रास्तों के नायाब निकले
जिसको समझा था सुकून का इक सहारा
वही तो दर्दों का पूरा हिसाब निकले
आईने ने भी हमें सच कह दिया आख़िर
हम ही अपने ही वजूद के बेहिसाब निकले
वक़्त ने हर बार हमें तोड़कर देखा
हम ही अपने ही सफ़र के जवाब निकले
न कोई शिकवा रहा, न कोई अब गिला है
हम अपने ही दिल के सच्चे जवाब निकले
मुकेश इलाहाबादी ये बात समझ आई
हम ही अपने ही किस्सों की किताब निकले
मुकेश ,,,,,,,,,,,
इस ग़ज़ल की बहर (Meter Name)
बहर-ए-रमल मुसद्दस महज़ूफ़
Strict Aruz Scansion
लोग तो अच्छे थे हम ही ख़राब निकले
फाएलातुन | फाएलातुन | फाइलुन
अपने ही अंदर से हम ही अज़ाब निकले
फाएलातुन | फाएलातुन | फाइलुन
हर क़दम पर खुद से ही लड़ते रहे हम
फाएलातुन | फाएलातुन | फाइलुन
हम अपने ही रास्तों के नायाब निकले
फाएलातुन | फाएलातुन | फाइलुन
जिसको समझा था सुकून का इक सहारा
फाएलातुन | फाएलातुन | फाइलुन
वही तो दर्दों का पूरा हिसाब निकले
फाएलातुन | फाएलातुन | फाइलुन
मुकेश इलाहाबादी ये बात समझ आई
फाएलातुन | फाएलातुन | फाइलुन
हम ही अपने ही किस्सों की किताब निकले
फाएलातुन | फाएलातुन | फाइलुन
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