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Saturday, 2 May 2026

लोग तो अच्छे थे हम ही ख़राब निकले

लोग तो अच्छे थे हम ही ख़राब निकले

अपने ही अंदर से हम ही अज़ाब निकले


हर क़दम पर खुद से ही लड़ते रहे हम

हम अपने ही रास्तों के नायाब निकले


जिसको समझा था सुकून का इक सहारा

वही तो दर्दों का पूरा हिसाब निकले


आईने ने भी हमें सच कह दिया आख़िर

हम ही अपने ही वजूद के बेहिसाब निकले


वक़्त ने हर बार हमें तोड़कर देखा

हम ही अपने ही सफ़र के जवाब निकले


न कोई शिकवा रहा, न कोई अब गिला है

हम अपने ही दिल के सच्चे जवाब निकले


मुकेश इलाहाबादी ये बात समझ आई

हम ही अपने ही किस्सों की किताब निकले


मुकेश ,,,,,,,,,,,


इस ग़ज़ल की बहर (Meter Name)


बहर-ए-रमल मुसद्दस महज़ूफ़

Strict Aruz Scansion


लोग तो अच्छे थे हम ही ख़राब निकले

फाएलातुन | फाएलातुन | फाइलुन


अपने ही अंदर से हम ही अज़ाब निकले

फाएलातुन | फाएलातुन | फाइलुन


हर क़दम पर खुद से ही लड़ते रहे हम

फाएलातुन | फाएलातुन | फाइलुन


हम अपने ही रास्तों के नायाब निकले

फाएलातुन | फाएलातुन | फाइलुन


जिसको समझा था सुकून का इक सहारा

फाएलातुन | फाएलातुन | फाइलुन


वही तो दर्दों का पूरा हिसाब निकले

फाएलातुन | फाएलातुन | फाइलुन


मुकेश इलाहाबादी ये बात समझ आई

फाएलातुन | फाएलातुन | फाइलुन


हम ही अपने ही किस्सों की किताब निकले

फाएलातुन | फाएलातुन | फाइलुन

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