उसी ज़मीन उसी आसमाँ के साथ रहे
हम अपने दिल के हर इक इम्तिहाँ के साथ रहे
जहाँ का दर्द मिला, वो ही ओढ़ कर बैठे
नए थे लोग मगर दास्ताँ के साथ रहे
न जाने किसने हमें राह से जुदा कर दिया
क़दम तो अपने थे पर कारवाँ के साथ रहे
वो जो ख़्वाब थे, आँखों से उतरते ही नहीं
हम अपने ख़्वाब की हर दास्ताँ के साथ रहे
गुज़र गए कई मौसम, मगर ये रंज रहा
हम एक लम्हे की बस रहगुज़ार के साथ रहे
न थी कोई भी पनाह, न कोई साया था
अजीब लोग थे, हम आसमाँ के साथ रहे
कभी जो सच ने पुकारा, तो डर भी साथ रहा
हम अपने डर के भी इक राज़दाँ के साथ रहे
मुकेश ,,,,,,,,
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