न कोई ख़्वाब, न कोई गुमाँ के साथ रहे
हम अपने सच के ही दरमियाँ के साथ रहे
जहाँ का दर्द मिला, वो ही ओढ़ कर बैठे
अजनबी लोग भी दास्ताँ के साथ रहे
न जाने किसने हमें राह से जुदा कर दिया
क़दम तो अपने थे, पर कारवाँ के साथ रहे
कभी जो टूट गए, फिर भी ये सलीक़ा था
हम अपने टूटने की दास्ताँ के साथ रहे
गुज़र गए कई मौसम, मगर ये रंज रहा
हम एक लम्हे की बस रहगुज़ार के साथ रहे
न थी कोई भी पनाह, न कोई साया था
अजीब लोग थे, हम आसमाँ के साथ रहे
मुकेश ,,,,,,,,,,
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