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Saturday, 2 May 2026

हवा के हस्ताक्षर : समापन

 हवा के हस्ताक्षर : समापन

इतनी हवाएँ आईं

तेज़, धीमी, गर्म, नम,

भीगी, महकती, थमी हुई…

हर एक ने

समय की स्लेट पर

कुछ न कुछ लिखा।

किसी ने शोर में,

किसी ने ख़ामोशी में,

किसी ने स्पर्श से,

किसी ने सिर्फ़ एहसास से।

मैंने हर बार

उन्हें पढ़ना चाहा—

पर हर बार

शब्द बदल गए,

और अर्थ

और गहरे हो गए।

अब समझ में आता है—

हवा लिखती नहीं,

बस याद दिलाती है

कि सब कुछ

क्षणिक है,

और फिर भी

अमर।

ये हस्ताक्षर

किसी एक कहानी के नहीं,

ये तो जीवन की

अनगिनत परतों के

अनकहे बयान हैं।

और अंत में—

जब सारी हवाएँ

अपनी-अपनी दिशा में

लौट जाती हैं,

समय की स्लेट पर

कुछ भी नहीं बचता…

सिवाय उस एहसास के

कि

कुछ था

जो हर बार

छूकर चला गया।

शायद वही

सबसे सच्चा

हस्ताक्षर था।


मुकेश ,,,,,,

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