बारिश से भीगी हवा के हस्ताक्षर
बारिश से भीगी हवा आई
जैसे आसमान ने
अपना बोझ उतारकर
धरती को सौंप दिया हो।
उसने समय की स्लेट पर
बूँदों से लिखा—
ऐसे अक्षर
जो गिरते ही
लुप्त हो जाते हैं,
पर अर्थ छोड़ जाते हैं।
छतों की थाप,
मिट्टी की गंध,
और भीगे हुए रास्ते—
सब मिलकर
उसकी भाषा बन गए।
ये हस्ताक्षर
स्थिर नहीं रहते,
हर क्षण बदलते हैं—
जैसे कोई कविता
खुद को लिखते-लिखते
मिटाती भी चलती हो।
मैंने उन्हें पढ़ना चाहा,
तो पलकों पर
कुछ ठहर गया—
न आँसू,
न पूरी खुशी,
बस एक भीगी-सी अनुभूति।
बारिश से भीगी हवा के हस्ताक्षर
कहते हैं—
जो गिरता है,
वही जीवन को हरियाली देता है।
और जो भीगता है,
वही
अपने भीतर
नई शुरुआत की
नमी सँजोता है।
मुकेश ,,,,,,,,,,,
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