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Saturday, 2 May 2026

किसी का आँचल छू के लौटी हवा के हस्ताक्षर

किसी का आँचल छू के लौटी हवा के हस्ताक्षर

किसी का आँचल छू के लौटी हवा

जैसे स्पर्श ने

अपने रहस्य

हवा में छोड़ दिए हों।


वो आई धीमे से,

पर अपने साथ लाई

एक हल्की-सी गरमाहट,

और कपड़े की सरसराहट में

छुपी हुई एक कहानी।


उसने समय की स्लेट पर

कोई स्पष्ट शब्द नहीं लिखा,

बस एक कोमल रेखा

जो लाज और लगाव के बीच

धीरे-धीरे काँपती रही।


ये हस्ताक्षर

नज़र नहीं आते,

पर महसूस होते हैं

जैसे किसी की उपस्थिति

बिना दिखे भी

पास बनी रहे।


मैंने उसे थामना चाहा,

तो वह ठहर न सकी

पर अपने पीछे

एक सुगंध छोड़ गई,

जो देर तक

मन में ठहरी रही।


किसी का आँचल छू के लौटी हवा के हस्ताक्षर

कहते हैं—

हर स्पर्श

अपने साथ एक स्मृति लाता है।


और जो छूकर भी

न ठहर पाए,

वही

सबसे गहराई से

हमारे भीतर

ठहर जाता है।


मुकेश ,,,,,,,,,,,,,

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