पसीने की गंध से गुज़री हवा के हस्ताक्षर
पसीने की गंध से गुज़री हवा
जैसे श्रम ने
अपना परिचय
हवा के हवाले कर दिया हो।
उसने समय की स्लेट पर
इत्र नहीं,
मेहनत से लिखा
ऐसे अक्षर
जो चमकते नहीं,
पर टिके रहते हैं।
हथेलियों की खुरदुराहट,
कंधों की थकान,
और देह की तपिश
सब मिलकर
एक अनकही भाषा बन गए।
ये हस्ताक्षर
कोमल नहीं होते,
इनमें सच्चाई की गंध है—
जिसे छुपाया नहीं जा सकता,
सिर्फ़ जिया जा सकता है।
मैंने उन्हें पढ़ना चाहा,
तो एहसास हुआ—
यह गंध नहीं,
जीवन का स्वाद है,
जो हर संघर्ष के बाद
देह से बाहर आता है।
पसीने की गंध से गुज़री हवा के हस्ताक्षर
कहते हैं
जो कमाया गया है,
वही सच में अपना है।
और जो देह से होकर गुज़रा है,
वही
समय की स्लेट पर
सबसे गहरा
लिखा जाता है।
मुकेश ,,,,,,,,
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