पहाड़ी हवा के हस्ताक्षर
पहाड़ी हवा आई
जैसे ऊँचाइयों ने
अपनी चुप्पी भेजी हो
मैदानों की ओर।
उसने समय की स्लेट पर
ठंडक से लिखा—
ऐसे अक्षर
जो छूते ही
मन को हल्का कर दें।
देवदारों की सरसराहट में
उसने अपनी भाषा बोली,
और दूर घाटियों में
गूँज बनकर
खुद को दोहराया।
ये हस्ताक्षर
सीधे नहीं होते—
ऊपर-नीचे,
घुमावदार—
जैसे रास्ते
जो कहीं पहुँचने से ज़्यादा
चलने के लिए बने हों।
मैंने उन्हें पढ़ना चाहा,
तो साँस गहरी हो गई—
जैसे भीतर
कुछ साफ़ होने लगा हो,
जो लंबे समय से
धुँधला पड़ा था।
पहाड़ी हवा के हस्ताक्षर
कहते हैं
ऊँचाई पर
शोर कम हो जाता है।
और जो कम सुनाई देता है,
वही
सबसे साफ़
समझ में आता है।
मुकेश ,,,,,,,,,,
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