समुद्री हवा के नमकीन हस्ताक्षर
समुद्री हवा आई
अपने साथ लिए
लहरों की थकान
और अनंत की गूँज।
उसने समय की स्लेट पर
नमी नहीं,
नमक से लिखा—
ऐसे अक्षर
जो होंठों पर चख लिए जाते हैं,
और फिर भी
कहानी अधूरी रह जाती है।
लहरों ने
उसकी भाषा को समझा,
किनारों पर आ-आकर
बार-बार दोहराया—
जैसे कोई नाम
भूलना भी चाहे,
तो भूल न पाए।
ये हस्ताक्षर
मीठे नहीं होते,
इनमें एक कड़वी सच्चाई है—
कि हर मिलन के भीतर
एक अनकही दूरी छुपी रहती है।
मैंने उन्हें पढ़ना चाहा,
तो स्वाद रह गया—
नमकीन,
जैसे किसी पुरानी याद का
आँसुओं से भीगा हुआ किनारा।
समुद्री हवा के नमकीन हस्ताक्षर
कहते हैं—
जो विशाल है,
वह अकेला भी होता है।
और जो बार-बार लौटता है,
वही
अपने भीतर
अधूरेपन की सबसे लंबी
लहर सँजोए रहता है।
मुकेश ,,,,,,,,,
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