नमी लिये हुई हवा के हस्ताक्षर
नमी लिये हुई हवा आई
जैसे बादलों ने
अपना अधूरा रुदन
उसके हाथों में सौंप दिया हो।
उसने समय की स्लेट पर
पानी से लिखा
ऐसे अक्षर
जो सूखते ही
और गहरे हो जाते हैं।
मिट्टी ने
उसकी बात पहचान ली,
और एक भीनी-सी गंध में
छुपा लिया
उसका पूरा संदेश।
ये हस्ताक्षर
न दिखते हैं पूरी तरह,
न मिटते हैं
बस एक परत बन जाते हैं
मन की सतह पर,
जहाँ हर स्पर्श
थोड़ा नम रह जाता है।
मैंने उन्हें पढ़ना चाहा,
तो उँगलियाँ भीग गईं
जैसे किसी याद ने
अचानक
अपने आँसू लौटा दिए हों।
नमी लिये हुई हवा के हस्ताक्षर
कहते हैं—
सूखापन अंत नहीं है,
उसके भीतर भी
एक प्रतीक्षा होती है।
और जो भीगता है,
वही
अपने भीतर
जीवन की सबसे मुलायम
कहानी लिखता है।
मुकेश ,,,,,,,,
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