महकती हवा के हस्ताक्षर
महकती हवा आई
जैसे किसी ने
यादों पर इत्र छिड़क दिया हो,
और समय अचानक
खुशबू बनकर फैल गया हो।
उसने समय की स्लेट पर
स्याही नहीं,
सुगंध से लिखा—
ऐसे अक्षर
जो दिखते नहीं,
पर पहचान लिए जाते हैं।
फूलों की पंखुड़ियों से
उसने शब्द उठाए,
और उन्हें हवा में
धीरे-धीरे बिखेर दिया—
जैसे कोई नाम
बिना पुकारे
सुनाई दे जाए।
ये हस्ताक्षर
रुकते नहीं,
बस फैलते हैं—
हर साँस के साथ
थोड़ा-थोड़ा भीतर उतरते हुए।
मैंने उन्हें थामना चाहा,
तो हाथ खाली रहे—
पर दिल भर गया,
किसी अनजानी,
पर जानी-पहचानी सी बात से।
महकती हवा के हस्ताक्षर
कहते हैं—
जो दिखाई नहीं देता,
वही सबसे गहरा असर छोड़ता है।
और जो बस महसूस होता है,
वही
सबसे सच्चा
हमारा अपना होता है।
मुकेश ,,,,,,,,
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