पीछा करता साया
वह साया
मेरे पीछे चलता नहीं—
मेरा पीछा करता है।
मैं तेज़ चलता हूँ,
तो वह भी लंबा होकर
मेरे कदमों से आगे निकलने की कोशिश करता है,
जैसे मुझसे पहले
मेरी मंज़िल पर पहुँचना चाहता हो।
कभी धूप में
वह साफ़-साफ़ दिखाई देता है—
इतना स्पष्ट
कि मैं उससे बच नहीं सकता,
और कभी अँधेरे में
वह गायब हो जाता है—
पर अजीब है,
उसकी गैर-मौजूदगी भी
मुझे महसूस होती रहती है।
मैंने कई बार
पीछे मुड़कर देखा—
हर बार वह वहीं था,
बिना थके, बिना रुके,
जैसे उसे कोई मंज़िल नहीं,
सिर्फ़ मेरा होना ही काफ़ी हो।
एक दिन मैंने दौड़ना शुरू किया—
सड़कों पर, गलियों में,
अपने ही भीतर की सीढ़ियों पर—
पर वह साया
हर मोड़ पर पहले से मौजूद था।
तब समझ में आया
वह मेरे पीछे नहीं,
मेरे भीतर चलता है।
मैं जहाँ भी जाता हूँ,
वह पहले से वहाँ होता है,
मेरे हर निर्णय के पहले,
हर डर के बाद,
हर ख़ामोशी के बीच।
अब मैं भागता नहीं,
बस उसके साथ चलता हूँ
क्योंकि
कुछ साये पीछा नहीं करते,
वे सिर्फ़
हमारे होने की गवाही देते हैं।
मुकेश --------
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