दीवार पर ठहरा साया
एक दीवार है
सफेद नहीं,
समय के धब्बों से भरी हुई,
जिस पर हर शाम
एक साया आकर ठहर जाता है।
वह मेरा नहीं लगता,
पर जब मैं हटता हूँ
तो वह भी काँपने लगता है
जैसे उसे भी
किसी आधार की तलाश हो।
कभी वह लंबा होकर
छत तक चढ़ जाता है,
जैसे भागना चाहता हो
इस सीमित आकार से,
और कभी सिकुड़कर
एक कोने में दुबक जाता है
जैसे अपने ही अस्तित्व से डर गया हो।
मैंने दीवार से पूछा
“तुम इसे क्यों थामे रहती हो?”
दीवार चुप रही,
पर उसके दरारों में
कुछ आवाज़ें थीं
शायद पुराने सायों की,
जो कभी यहाँ ठहरे थे।
वह साया
हर दिन आता है,
हर दिन बदलता है,
पर एक बात स्थिर है—
उसका ठहराव।
जैसे वह भाग नहीं सकता,
जैसे मैं भी नहीं।
कभी-कभी लगता है
वह साया नहीं,
एक प्रश्न है
जो रोशनी से जन्म लेकर
अंधेरे में उत्तर ढूँढता है।
और मैं
उस दीवार के सामने खड़ा,
सोचता हूँ
क्या हम सब
किसी न किसी दीवार पर
ठहरे हुए साये ही तो नहीं?
मुकेश --------
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